Sunday | Jun 21, 2026
The Raw File

अपराधियों ने तीन लोगों को जिंदा जलाया, कानून की चिता भी सजा दी!

रायपुर/ छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में जो हुआ, वह किसी फिल्म का दृश्य नहीं था। एक फॉर्च्यूनर को घेर लिया गया, उसमें आग लगा दी गई और भाजपा नेता भरत सिंह सहित तीन लोगों को जिंदा जला दिया गया। बताया जा रहा है कि विवाद अवैध रेत खनन को लेकर था। सबसे चिंताजनक बात यह है कि घटना से जुड़े दोनों स्थानीय राजनेताओं से जुड़े बताए जा रहे हैं। यदि यह सच है तो सवाल और ज्यादा गंभीर हो जाता है।
आखिर अपराधियों में इतना दुस्साहस आया कहां से कि वे दिनदहाड़े तीन लोगों को जिंदा जलाने का फैसला कर लें? इस बात का सीधा मतलब है कि उनके मन से कानून का भय समाप्त हो गया था।

जिस राज्य में अपराधी यह सोचने लगें कि हत्या के बाद भी बच निकलेंगे, वहां ऐसी घटनाएं असामान्य नहीं रह जातीं। अपराधियों को मालूम है कि घटनास्थल पर मौजूद लोग डर जाएंगे, गवाही नहीं देंगे, पुलिस सबूत जुटाने में संघर्ष करेगी और वर्षों बाद अदालत में संदेह का लाभ मिल जाएगा। यही सोच अपराध को जन्म देती है और यही सोच अपराधियों का हौसला बढ़ाती है।

समझने वाली बात है कि अवैध रेत खनन अब सिर्फ राजस्व चोरी का मामला नहीं रह गया है। यह करोड़ों रुपये का ऐसा काला कारोबार बन चुका है जिसके लिए लोग गोली चलाने, आग लगाने और जान लेने से भी नहीं हिचक रहे। इस क्षेत्र में ऐसी घटनाएं बीते वर्षों में लगातार होती रही है परंतु यह घटना चरम का प्रतीक है। यहां पर मेरा सवाल यह है कि यदि अवैध खनन पर प्रशासन की कड़ाई होती तो क्या तीन लोगों को जिंदा जलाने जैसी नौबत आती?

सरकार को यह समझना होगा कि कानून व्यवस्था कोरी बयानबाजी से नहीं चलती। कानून व्यवस्था तब मजबूत मानी जाती है जब अपराधी कोई अपराध करने से पहले दस बार सोचें। आज स्थिति उल्टी दिखाई देती है। अपराधी वारदात कर रहे हैं और आम आदमी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

यही कारण है कि देशभर में उत्तर प्रदेश मॉडल की चर्चा होती है। वहां अपराधी कम से कम यह जानते हैं कि कानून की पकड़ से बच निकलना आसान नहीं है और अगर कोशिश की तो एनकाउंटर का डर है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपराधियों के मन में कानून का भय होना आवश्यक है। यह भय यदि समाप्त हो जाए तो फिर जंगलराज और कानून के राज में अंतर ही क्या रह जाएगा?

कोरिया की घटना सिर्फ तीन लोगों की हत्या नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है। सरकार चाहे किसी की हो, अपराधी का राजनीतिक रंग नहीं देखा जाना चाहिए। यदि इस मामले में त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो संदेश यही जाएगा कि राज्य में अवैध कारोबार और उससे जुड़े गिरोह कानून से ज्यादा ताकतवर हैं।

सबसे बड़ा सवाल स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका को लेकर भी उठता है। यदि अवैध रेत खनन को लेकर क्षेत्र में लंबे समय से तनाव था तो पुलिस और प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी? और यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? तीन लोगों की जान जाने के बाद केवल आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी। सरकार को जिले के जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी चाहिए। जिस क्षेत्र में अवैध खनन, दबंगई और हिंसा इस स्तर तक पहुंच जाए कि लोग जिंदा जला दिए जाएं, वहां केवल अपराधी ही नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता भी कटघरे में खड़ी होती है। यदि दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना मुश्किल होगा।
छत्तीसगढ़ को आज भाषण नहीं, कार्रवाई चाहिए। अपराधियों को यह एहसास कराना होगा कि हत्या, आगजनी और माफियागिरी का अंत जेल की सलाखों के पीछे होता है, सत्ता के गलियारों में नहीं।
कोरिया की आग में केवल तीन लोग नहीं जले हैं, कानून भी झुलसता दिखाई दे रहा है।

@देवेंद्र किशोर गुप्ता


Raw File



संबंधित खबरें